Friends,
And here is the second one, telling sth about
evolution of a person from being decently OK to going completely berserk.
Amitabh Thakur
IPS,
Currently at IIM Lucknow
# 94155-34526
डरना
जरूरी है (कविता)
मैं
डरता नहीं,
क्यूंकि
मैं मरा हुआ हूँ,
मुझे
भय नहीं छूता,
क्यूंकि
पडा हुआ हूँ.
मुझे
तुम बड़े नहीं दीखते,
तुमसे
कुछ चाहता जो नहीं,
मुझे
तुम्हारा समय नहीं चाहिए,
मेरा
समय इतना बेकार नहीं.
मुझे
क्या दोगे भिखारी,
दिन
भर तो मांगते रहते हो,
छोटी-छोटी
बात पर,
मंदिर-मस्जिद
भागते हो.
ठीक
है तुम को ,
लोग
बड़ा कहते हैं,
मुझे
नहीं दिख पाते,
शायद
आँखों में खोट है.
बेवक़ूफ़
भी हूँ,
कुछ
पागल सा भी,
पहले
ऐसा नहीं था,
पर
सब ठीक क्यूँ नहीं था.
सोचता
हूँ तो अब,
कुछ
ज्यादा ही अच्छा लगता है,
जब
कोई कहता है परेशान हैं,
मुझे
कुछ बौड़म सा दिखता है.
मेरा
इलाज़ करों,
जरूरी
हो गया है,
इच्छाएं
तो हैं,
पर
तुमसे कुछ नहीं चाहता.
अमिताभ
ठाकुर
94155 - 34526